झीरम कांड में अदालत के फैसले पर भूपेश बघेल ने उठाई उंगली

रायपुर, 5 सितंबर 2026। छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने झीरम कांड में अदालत के फैसले पर उंगली उठाई है। उन्होंने सोशल मीडिया पर किये गए पोस्ट में लिखा है कि झीरम कांड में अदालत के फैसले को देखकर लगता है कि यह अधूरा न्याय है।

पहली बात यह है कि झीरम घाटी में रचा गया षडयंत्र दुनिया के लोकतंत्र के इतिहास का सबसे बड़े राजनीतिक नरसंहार था और ऐसे मामले में निचले स्तर के सिर्फ 10 नक्सलियों को सजा मिलने को न्याय नहीं कहा जा सकता।

इस घटना की जांच कर रही एजेंसी एनआईए ने खुद ही कहा था कि झीरम की घटना को 200 लोगों ने अंजाम दिया था। एनआईए स्वयं ने 39 लोगों को मुलजिÞम बनाया था। ये और बात है कि जांच में लगातार लापरवाही बरत रही एनआईए 10 से अधिक लोगों को पकड़ ही नहीं पाई। एनआईए ने नक्सलियों के शीर्ष नेताओं के नाम तो पहले ही एफआईआर से हटा दिए थे। पता नहीं किसके कहने पर।

दूसरी बात यह है कि जांच आयोग ने सिर्फ सुरक्षा व्यवस्था में कमी को लेकर जांच की है न कि आपराधिक मामले में सजा दिलाने के लिए। सच यही है कि झीरम के पीछे रचे गए भयानक राजनीतिक षडयंत्र की जांच आज तक नहीं हुई है। दूसरी जांच इसलिए नहीं हुई क्योंकि इसका एक स्तर पर एनआईए विरोध करती रही और दूसरे स्तर पर भारतीय जनता पार्टी के नेता विरोध करते रहे।

जांच हुई ही नहीं

भूपेश बघेल ने आगे लिखा है- कांग्रेस पार्टी और पीड़ित परिवारों की ओर से हमेशा कहा गया कि इस घटना में वृहद राजनीतिक षडयंत्र हुआ है और इसकी जांच आवश्यक है। पर एनआईए ने इसकी जांच की ही नहीं।

जब 2020 में शहीद उदय मुदलियार के सुपुत्र जितेंद्र मुदलियार ने शिकायत की तब कहीं जाकर छत्तीसगढ़ पुलिस ने एक दूसरी एफआईआर की। पता नहीं क्यों, इस एफआईआर पर एनआईए को आपत्ति हो गई और इसके खिलाफ एजेंसी सुप्रीम कोर्ट चली गई। सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर, 2023 में इस पर फैसला दिया और एनआईए की आपत्ति खारिज कर दी गई। लेकिन तब तक राज्य में फिर भाजपा की सरकार आ गई थी और अब तक ढाई साल में इस एफआईआर पर कोई जांच नहीं की गई है।

उन्होंने आगे कहा कि दरअसल भाजपा आपराधिक षडयंत्र की जांच होने ही नहीं देना चाहती। क्यों नहीं होने देना चाहती यह लोग समझते हैं।

जांच आयोग में भी भाजपा का अडंगा

भूपेश बघेल ने आगे लिखा- वर्ष 2013 में घटना के बाद एक जांच आयोग का गठन किया गया था। इस आयोग को भी सुरक्षा में कमी पर जांच करनी थी ना कि आपराधिक मामले में सजा दिलाने के लिए। जस्टिस प्रशांत मिश्रा जांच आयोग ने जब अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की तब छत्तीसगढ़ राज्य सरकार ने यह कहा कि यह रिपोर्ट अधूरी है और उसे पूरा करने के लिए जस्टिस मिन्नहाजुद्दीन और जस्टिस सतीश अग्रिहोत्री के नेतृत्व में एक नया जांच आयोग बनाया।

इस नए जांच आयोग के खिलाफ भाजपा के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष धरमलाल कौशिक हाईकोर्ट पहुंच गए और उनकी याचिका पर इस आयोग पर रोक लगा दी गई। यह रोक आज भी प्रभावी है। जैसा कि मैंने कहा, भाजपा के नेता झीरम में हुए आपराधिक षडयंत्र की जांच होने ही नहीं देना चाहते। जब तक यह जांच नहीं होगी, तब तक झीरम का न्याय अधूरा रहेगा।

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