Highlights
- रिलायंस की रिफाइनरी से ग्रीन एनर्जी तक भारत की ताकत का प्रदर्शन
- अमेरिकी ऊर्जा रणनीति में जामनगर बना अहम केंद्र
- मुकेश अंबानी की कंपनी के साथ सहयोग बढ़ाने पर वाशिंगटन का जोर
नई दिल्ली, 22 अक्टूबर 2026। वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारत की बढ़ती ताकत और अत्याधुनिक औद्योगिक तकनीक का प्रभाव अब अमेरिका की रणनीति में भी दिखाई देने लगा है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो का गुजरात के जामनगर स्थित रिलायंस इंडस्ट्रीज के विशाल रिफाइनरी परिसर का दौरा इसी बदलते समीकरण का संकेत है। दुनिया के सबसे बड़े एकल-स्थल रिफाइनरी परिसर में भारत की तकनीकी क्षमता, बड़े पैमाने पर उत्पादन और अलग-अलग स्रोतों से मिलने वाले कच्चे तेल के शोधन की दक्षता को करीब से देखने के बाद अमेरिका ने रिलायंस के साथ ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की इच्छा जाहिर की है।
यह दौरा ऐसे समय हुआ है, जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का प्रशासन भारत में अमेरिकी ऊर्जा की बिक्री बढ़ाने, पश्चिमी गोलार्ध से प्राप्त कच्चे तेल के शोधन को प्रोत्साहित करने और अमेरिकी कंपनियों के लिए नए निवेश अवसर तलाशने में जुटा है। ऐसे में जामनगर केवल एक औद्योगिक परिसर नहीं, बल्कि भारत की तकनीकी क्षमता और वैश्विक ऊर्जा कूटनीति का महत्वपूर्ण केंद्र बनकर उभरा है।
जामनगर की ताकत के सामने अमेरिका की बढ़ी दिलचस्पी
मार्को रूबियो अपनी पत्नी के साथ जामनगर पहुंचे। उन्होंने रिलायंस की रिफाइनरी, उभरते स्वच्छ ऊर्जा विनिर्माण केंद्र और वन्यजीव संरक्षण परियोजना वनतारा का दौरा किया। रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी के नेतृत्व में अंबानी परिवार के सदस्यों ने अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का स्वागत किया। इस दौरान नीता अंबानी, ईशा अंबानी, आनंद पीरामल, अनंत अंबानी, राधिका मर्चेंट, रिलायंस के कार्यकारी निदेशक पीएमएस प्रसाद और भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर मौजूद रहे।
जामनगर पहुंचने से एक दिन पहले रूबियो भारत को कच्चे तेल के शोधन के मामले में महाशक्ति बता चुके थे। उन्होंने भारत से वेनेजुएला के कच्चे तेल का अधिक शोधन करने का आग्रह भी किया था। उनका यह रुख बताता है कि अमेरिका के लिए भारत की रिफाइनिंग क्षमता कितनी महत्वपूर्ण हो गई है।
भारत की इस ताकत का सबसे बड़ा उदाहरण जामनगर है, जहां प्रतिदिन लगभग 14 लाख बैरल कच्चे तेल के शोधन की क्षमता है। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से आने वाले कच्चे तेल को संसाधित कर बड़े पैमाने पर डीजल और अन्य पेट्रोलियम उत्पाद तैयार करने की क्षमता रिलायंस को वैश्विक ऊर्जा बाजार में विशिष्ट स्थान दिलाती है।
रिलायंस की तकनीक बनी अमेरिका के लिए भी अहम
जामनगर की सबसे बड़ी विशेषता केवल उसकी विशाल क्षमता नहीं, बल्कि विभिन्न गुणवत्ता और प्रकृति वाले कच्चे तेल को संसाधित करने की तकनीकी दक्षता है। यही क्षमता भारत को अंतरराष्ट्रीय बाजार में बदलती परिस्थितियों के अनुसार ऊर्जा आपूर्ति के विकल्प तलाशने में मदद करती है।
अमेरिका अब इसी क्षमता का लाभ उठाना चाहता है। रूबियो ने रिलायंस के स्वामित्व वाले समाचार समूह नेटवर्क18 से बातचीत में कहा कि वाशिंगटन पश्चिमी गोलार्ध से प्राप्त कच्चे तेल के शोधन के क्षेत्र में रिलायंस के साथ अधिक निकटता से काम करना चाहता है। उन्होंने इसे दोनों देशों के लिए लाभकारी सहयोग बताया।
इस घटनाक्रम का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि अमेरिका अपनी ऊर्जा नीति के तहत अमेरिकी उत्पादकों के लिए बाजार विस्तार चाहता है, जबकि रिलायंस के पास बड़े पैमाने पर कच्चे तेल के शोधन और तैयार ईंधन के निर्यात की स्थापित क्षमता है। इस तरह भारत की औद्योगिक दक्षता अमेरिका की ऊर्जा रणनीति में उपयोगी भूमिका निभा सकती है।
अमेरिका में रिफाइनरी लगाने की तैयारी, रिलायंस का दोतरफा दांव
रिलायंस का योगदान केवल भारत में ऊर्जा उत्पादन तक सीमित नहीं है। कंपनी अमेरिका के टेक्सस राज्य के ब्राउन्सविल में प्रस्तावित नई रिफाइनरी परियोजना से भी जुड़ी है। इस परियोजना की क्षमता प्रतिदिन लगभग 1.68 लाख बैरल बताई गई है। अमेरिका फर्स्ट रिफाइनिंग द्वारा विकसित की जा रही इस परियोजना को अमेरिकी हल्के शेल क्रूड के शोधन के अनुरूप तैयार करने की योजना है।
परियोजना पूरी होने पर यह लगभग पांच दशकों में अमेरिका की पहली बड़ी नई रिफाइनरी होगी। रिलायंस ने इससे तैयार होने वाले परिष्कृत उत्पादों की खरीद के लिए दीर्घकालिक समझौता भी किया है।
यह निवेश भारत-अमेरिका ऊर्जा संबंधों को एक नया आयाम देता है। एक ओर अमेरिका भारतीय कंपनी के साथ कच्चे तेल के शोधन में सहयोग बढ़ाना चाहता है, तो दूसरी ओर रिलायंस अमेरिकी ऊर्जा ढांचे में निवेश और तैयार उत्पादों की खरीद के माध्यम से अपनी वैश्विक उपस्थिति मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
भारत की कंपनियों का अमेरिकी औद्योगिक क्षेत्र में निवेश यह भी दर्शाता है कि आर्थिक सहयोग केवल एकतरफा खरीद-बिक्री तक सीमित नहीं है, बल्कि दोनों देशों के बीच पूंजी, तकनीक और बाजार का परस्पर संबंध विकसित हो रहा है।
एलपीजी आयात में अमेरिका की हिस्सेदारी 67 प्रतिशत तक पहुंची
भारत-अमेरिका ऊर्जा कारोबार में बदलाव का एक महत्वपूर्ण पहलू तरल पेट्रोलियम गैस यानी एलपीजी की आपूर्ति है। भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर के अनुसार, पिछले एक वर्ष में भारत के कुल एलपीजी आयात में अमेरिका की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत से भी कम से बढ़कर 67 प्रतिशत हो गई है। उनके मुताबिक अमेरिका अब भारत का सबसे बड़ा एलपीजी आपूर्तिकर्ता बन गया है।
गोर ने रिलायंस की अमेरिकी रिफाइनरी निवेश योजना का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार, इस परियोजना से अमेरिका में ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने और रोजगार के नए अवसर पैदा करने में मदद मिल सकती है।
यहां भारत के लिए महत्वपूर्ण सवाल केवल आयात बढ़ाने का नहीं, बल्कि ऊर्जा आपूर्ति के स्रोतों में विविधता बनाए रखने का है। भारत को अमेरिका के साथ कारोबार बढ़ाने के साथ-साथ रूस, पश्चिम एशिया और अन्य बाजारों से कच्चे तेल की खरीद के विकल्प भी खुले रखने होंगे।
रूसी तेल से वेनेजुएला तक, जामनगर की भूमिका अहम
जुलाई से सितंबर 2026 के दौरान जामनगर रिफाइनरी में इस्तेमाल किए गए कच्चे तेल का लगभग एक-तिहाई हिस्सा रूस से आया था। अमेरिका भारत को वेनेजुएला सहित पश्चिमी गोलार्ध से अधिक कच्चा तेल खरीदने और उसका शोधन करने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है।
हालांकि, कच्चे तेल के स्रोत में बदलाव केवल कूटनीतिक दबाव से तय नहीं होता। कीमत, माल ढुलाई का खर्च, रिफाइनरी की तकनीकी जरूरतें और वैकल्पिक आपूर्ति की उपलब्धता भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
यही वह क्षेत्र है, जहां भारत की रिफाइनिंग क्षमता उसे रणनीतिक बढ़त देती है। जब किसी देश के पास अलग-अलग स्रोतों से आए कच्चे तेल को संसाधित करने के लिए पर्याप्त तकनीक और औद्योगिक क्षमता होती है, तो उसके पास अंतरराष्ट्रीय बाजार में विकल्प चुनने की अधिक गुंजाइश रहती है।
ग्रीन एनर्जी में भी बड़ी छलांग की तैयारी
रिलायंस की ताकत केवल पारंपरिक पेट्रोलियम उद्योग तक सीमित नहीं है। जामनगर में प्रस्तावित धीरूभाई अंबानी ग्रीन एनर्जी गीगा कॉम्प्लेक्स कंपनी की दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति का अहम हिस्सा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, लगभग 5,000 एकड़ क्षेत्र में करीब 75,000 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से विकसित किए जा रहे इस परिसर में सौर मॉड्यूल, बैटरी भंडारण प्रणाली, फ्यूल सेल, इलेक्ट्रोलाइजर और पावर इलेक्ट्रॉनिक्स के विनिर्माण को एकीकृत करने की योजना है।
यदि यह योजना अपने निर्धारित स्वरूप में आगे बढ़ती है, तो भारत की स्वच्छ ऊर्जा विनिर्माण क्षमता को मजबूत करने में इसका महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है। इससे देश को भविष्य में ऊर्जा संक्रमण के लिए जरूरी उपकरणों और तकनीकों के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने का अवसर मिलेगा।
रूबियो ने वनतारा का भी दौरा किया, जो रिलायंस इंडस्ट्रीज और रिलायंस फाउंडेशन की वन्यजीव बचाव, पुनर्वास और संरक्षण पहल है। इस दौरे में पारंपरिक ऊर्जा, स्वच्छ ऊर्जा और संरक्षण के क्षेत्र में रिलायंस की विभिन्न गतिविधियां अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल के सामने आईं।
व्यापार समझौते पर बातचीत के बीच अहम दौरा
रूबियो की जामनगर यात्रा से पहले मुंबई में विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ उनकी बातचीत हुई थी। इसमें ऊर्जा, व्यापार, निवेश, रक्षा और महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों सहित द्विपक्षीय सहयोग के मुद्दों पर चर्चा हुई। दोनों देश व्यापार समझौते को लेकर लंबित मतभेद दूर करने की कोशिश भी कर रहे हैं। रूबियो के अनुसार, समझौते से जुड़े अब केवल कुछ मुद्दे ही बाकी हैं।
जामनगर में अमेरिकी विदेश मंत्री का दौरा इसी व्यापक कूटनीतिक और आर्थिक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। हालांकि, इस निजी दौरे के दौरान किसी नए समझौते या अमेरिकी नीति में औपचारिक बदलाव की घोषणा नहीं हुई।
फिर भी, इस घटनाक्रम से एक बात स्पष्ट होती है कि भारत की विशाल रिफाइनिंग क्षमता, रिलायंस की औद्योगिक दक्षता और ऊर्जा क्षेत्र में निवेश की संभावनाएं अमेरिका के लिए महत्वपूर्ण हैं।
