धर्म की प्रासंगिकता हर काल में रही और आगे भी रहेगी : डॉ. विजय श्रीजी

0
35

रायपुर। टैगोर नगर लालगंगा पटवा भवन के चातुर्मास प्रसंग में साध्वी डॉ. विजयश्रीजी ने धर्म की प्रासंगिकता को चिन्हांकित करते हुए कहा कि धर्म का अस्तित्व हर काल में बना रहा है आगे भी रहेगा अत: धर्म की अनुमोदना करते हुए समाज व परिवार के हर किसी को धर्म का आचरण करते हुए धर्म मार्ग पर चलते रहने की प्रेरणा देते रहना चाहिए। उपस्थित धर्मश्रद्धालुओं से उन्होंने कहा कि आज की जीवन शैली प्रत्येक क्षेत्र में बदल चुकी है। जो कल था वह आज नही है और यह भी सुनिश्चित है कि जो आज है वह कल भी नही रहेगा। यह परिवर्तन विचारणीय है। पहले घर के अनुजों का शिविर घर के बुजुर्गो के साथ हुआ करता था, जीवन सरल था। जीवनयापन के साधन सीमित थे। जीवन में श्रम का स्थान था। धीरे-धीरे सुख के साधन बढ़ते गए और परिवर्तन का दौर चलता गया। किन्तु विडम्बना यह रही कि श्रम से भी जी चुराने की प्रवृत्ति को बल मिला। विलासिता के साधन बढ़े और हम अपने धर्म और आत्मा से छल करने लगे। आधुनिकता और अंधानुकरण की प्रवृत्तियों ने मनुष्य के पारस्परिक पर आक्रमण करना आरम्भ कर दिया। हम समय का रोना रोने लगे। परिणामत: वास्तविक शांति हम से दूर हो गई, आज असंतोष में जीकर भी हम व्यस्त हो गए। परिवार में संवाद की स्थिति नहीं रह गई। बच्चे, माँ-बाप से, माता-पिता बच्चों से अपनी बात नही कह पाते। आज कुछ ऐसे घर भी हैं जहाँ बच्चों और माँ-बाप के बीच कई दिनों तक मुलाकात नहीं होती। यह स्थिति अत्यन्त दुखद् और दारुण है। जीवन में व्यवहारिक ज्ञान के लिए हम लाखों रुपए खर्च करने तैयार हैं लेकिन जीवन निर्माण की दिशा में धार्मिक या संस्कार की पाठशाला में बच्चों को भेजने तैयार नहीं है। बच्चे अपने कुल व धर्म का संस्कार ही नहीं जानते। ऐसी स्थिति में बच्चे भविष्य में समाज को या राष्ट्र को क्या देंगे। यह सोचकर भय होता है। अत: हमारे संस्कारों में धर्म की प्रेरणा, धर्म के आश्रय का होना नितांत आवश्यक है। चातुर्मास प्रचार प्रभारी विमल पटवा ने यह जानकारी देते हुए बताया कि चातुर्मास की पूर्णता में अब केवल तीन दिन शेष रहे। बुधवार को धर्म स्थल में परमपूज्य चैथमल की जन्म जयंती मनाई जाएगी। मुनिश्री चैथमलजी महाराज विलक्षण प्रतिभा संपन्न संत रत्न थे। उनके जीवन में वाणी और आचरण का अभूतपूर्व संगम था।