प्रयागराज, 12 दिसंबर 2025। माघ मेले के इतिहास में पहली बार मेले के दर्शन-तत्त्व और सांस्कृतिक आस्था को साकार करते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के स्तर से माघ मेला 2026 का आधिकारिक लोगो जारी किया गया है। यह लोगो तीर्थराज प्रयाग की पवित्रता, संगम की तपोभूमि और माघ मास के ज्योतिषीय महत्व को एक साथ जोड़ते हुए मेले की दिव्यता को दर्शाता है। डिजाइन में प्रयागराज की आध्यात्मिक परंपरा, सनातन संस्कृति और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।
सूर्य-चंद्रमा की 14 कलाओं का दिव्य प्रतीक
लोगो में सूर्य और चंद्रमा की 14 कलाओं को विशेष रूप से दर्शाया गया है। भारतीय ज्योतिष के अनुसार सूर्य, चंद्रमा और 27 नक्षत्रों की स्थिति ही माघ मेले की कालगणना तय करती है। चंद्रमा अपनी परिक्रमा लगभग 27.3 दिनों में पूर्ण करता है और इस अवधि में बदलने वाली उसकी कलाएं आध्यात्मिक ऊर्जा को प्रभावित करती हैं।
जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है और पूर्णिमा के दिन चंद्रमा माघी या अश्लेषा-पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्रों के समीप होता है, तभी माघ मास बनता है। यही समय आध्यात्मिक साधना और संगम स्नान के लिए सर्वोत्तम माना गया है। इसी दुर्लभ संयोग पर आधारित माघ मेले का आयोजन होता है जो इस लोगो में स्पष्ट परिलक्षित होता है।
चंद्र कलाएं और माघ मास की आध्यात्मिक ऊर्जा
माना जाता है कि चंद्रमा की 14 कलाएं मानव जीवन की मानसिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक ऊर्जा से गहरा संबंध रखती हैं। अमावस्या से पूर्णिमा की ओर बढ़ता शुक्ल पक्ष साधना, ध्यान और तपस्या के लिए श्रेष्ठ माना जाता है। माघ स्नान की तिथियां इसी सूक्ष्म चंद्र-ऊर्जा के संतुलन पर निर्धारित होती हैं।
माघ मास को अनुशासन, तप, सोच की शुद्धि और दिव्य ऊर्जा का महीना कहा गया है। इसी कारण इस अवधि में कल्पवास, संगम स्नान, दान-पुण्य, हवन-जप और निरंतर साधना का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यता है कि माघ में किए गए कार्य मनुष्य को निरोगी, ऊर्जावान और मानसिक रूप से अधिक शुद्ध बनाते हैं।
अक्षयवट और सनातन परंपरा का दर्शक
लोगो में प्रयागराज के अक्षयवट का सूक्ष्म प्रतीकात्मक उल्लेख भी शामिल है। धार्मिक मान्यता है कि इसकी जड़ों में भगवान ब्रह्मा, तने में भगवान विष्णु और शाखाओं में भगवान शिव का वास होता है। इसके दर्शन मात्र से मोक्ष मार्ग सरल हो जाता है।
सनातन धर्म में कल्पवासियों के लिए अक्षयवट का महत्व अत्यंत अद्वितीय है। लोगो में संत-महात्मा की उपस्थिति उस परंपरा को दर्शाती है जिसके अनुसार हजारों वर्षों से ऋषि-मुनि आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त करने हेतु इस भूमि पर आते रहे हैं।
हनुमान जी और संगम स्नान की पूर्णता
धार्मिक मान्यता है कि माघ में किए गए कल्पवास और विभिन्न अनुष्ठानों का पूर्ण फल तभी मिलता है जब कल्पवासी संगम स्नान के उपरांत लेटे हुए हनुमान जी के दर्शन करते हैं। इसीलिए लोगो में हनुमान मंदिर और पताका की उपस्थिति को विशेष स्थान दिया गया है। यह माघ मेले में किए गए तप-साधना की पूर्णता का प्रतीक है।
साइबेरियन पक्षियों से लेकर श्लोक तक
माघ मेले का एक अनूठा आकर्षण हर वर्ष संगम पर पहुंचने वाले साइबेरियन पक्षी भी हैं। लोगो में इन पक्षियों की आकृति प्रयागराज की प्राकृतिक समृद्धि और पर्यावरणीय विशेषता को दर्शाती है।
लोगो पर अंकित श्लोक माघे निमज्जनं यत्र पापं परिहरेत् ततः यह संदेश देता है कि माघ में पवित्र नदियों में स्नान करने से पापों का क्षय होता है और मन-तन शुद्ध होता है।
डिजाइन टीम की रचनात्मक प्रस्तुति
यह लोगो मेला प्राधिकरण द्वारा नियुक्त डिजाइन कंसल्टेंट अजय सक्सेना और प्रागल्भ अजय द्वारा तैयार किया गया है। दोनों डिजाइनरों ने ज्योतिषीय गणना, सांस्कृतिक मूल्यों और आध्यात्मिक प्रतीकों को एकीकृत कर एक ऐसा डिजाइन विकसित किया है जो माघ मेले की महिमा और ऐतिहासिक परंपरा को आधुनिक शैली में प्रस्तुत करता है।
















