ई कॉमर्स नियम घरेलू ई कॉमर्स कंपनियों पर भी लागू हो : कैट

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रायपुर। कॉन्फ़ेडरेशन ऑफ आल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अमर पारवानी, प्रदेष कार्यकारी अध्यक्ष मगेलाल मालू, प्रदेष कार्यकारी अध्यक्ष विक्रम सिंहदेव, प्रदेष महामंत्री जितेन्द्र दोषी, प्रदेष कार्यकारी महामंत्री परमानन्द जैन, प्रदेष कोषाध्यक्ष अजय अग्रवाल, एवं प्रवक्ता राजकुमार राठी ने बताया कि केंद्रीय वाणिज्य मंत्री सुरेश प्रभु को कॉन्फ़ेडरेशन ऑफ़ आल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) ने आज भेजे एक पत्र में स्पष्ट रूप से आगाह किया है की यदि किसी भी दबाव में ई कॉमर्स पर एफडीआई पालिसी को लागू करने की तारीख 1 फरवरी को आगे बढ़ाया या स्थगित किया तो सरकार को इसके राजनैतिक परिणाम समझ लेने चाहिए और सरकार के ऐसे किसी भी कदम के खिलाफ मजबूर होकर देश के 7 करोड़ व्यापारियों को एक राष्ट्रीय अभियान छेड़ना पड़ेगा । यह मामला अब छोटे व्यापारियों और बड़ी ई कॉमर्स कंपनियों के बीच का है और देखना अब यह है की सरकार किसका पक्ष लेती है । देश में लगभग 7 करोड़ व्यापारी हैं जो लगभग 30 करोड़ लोगों को रोजगार देते हैं और देश का रिटेल व्यापार प्रतिवर्ष लगभग 42 लाख करोड़ रुपये का है जिस पर कब्ज़ा जमाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों ने ई कॉमर्स का रास्ता चुना है । कैट ने कहा की मीडिया में छपे समाचारों के अनुसार कुछ बड़ी ई कॉमर्स कंपनियों ने कहा है की उन्हें पालिसी समझने का कुछ और वक़्त चाहिए या इस पालिसी के लागू होने से उनका उपभोक्ता छिन्न भिन्न हो जायेगा और उन्हें अपने बिज़नेस मोडल को पालिसी के अनुसार बदलने के लिए समय चाहिए और लिहाजा इस आधार पर पालिसी की अंतिम तारीख को आगे बढ़ाया जाए । कैट के राष्ट्रीय अध्यक्ष बी.सी.भरतिया, राष्ट्रीय महामंत्री प्रवीन खंडेलवाल एवं राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अमर पारवानी ने श्री प्रभु को भेजे पत्र में कहा है की इस बात से यह साफ़ है की ये कंपनियां गत दो वर्षों से पालिसी का उल्लंघन कर रही थी और उनका सारा व्यापार केवल अस्वस्थ व्यापारिक नीतियों पर टिका था और ऐसे में उनके पालिसी उल्लंघन को ठीक करने के लिए सरकार उनको वक़्त दे जो कतई भी उचित नहीं होगा । श्री भरतिया , श्री खंडेलवाल एवं अमर पारवानी ने कहा की ये कंपनियां किस प्रकार के उपभोक्ता के छिन्न भिन्न होने की बात कर रही हैं । ई कॉमर्स एक खुला बाज़ार है जिसमें हजारों कंपनियां पहले से ही काम कर रही है जबकि इन कंपनियों को यह ग़लतफ़हमी है की यह बाज़ार केवल उन पर टिका हुआ है और यदि उनका व्यापार समाप्त होता है तो उपभोक्ता को परेशानी होगी जबकि ऐसा कतई नहीं है ! उपभोक्ता के पास बहुत विकल्प है जहाँ से वो अपनी जरूरतें पूरी कर सकता है ! यह बेहद हास्यास्पद है की इन कंपनियों को अपने उपभोक्ताओं को अपने साथ जोड़े रखने के लिए सरकार का सहारा चाहिए और उनकी गलत नीतियों और पालिसी के उल्लंघन में सरकार भी शामिल हो । तीनों व्यापारी नेताओं ने कहा की यह पालिसी वर्ष 2016 से लागू है और प्रेस नोट 2 केवल मात्र पालिसी का स्पष्टीकरण ही है और यदि यह कंपनियां दो वर्षों में भी पालिसी नहीं समझ पायी तो बेहतर है वो अपना व्यापार बंद कर दें । सच तो यह है की इन कंपनियों ने गत दो वर्षों में पालिसी को देखा तक नहीं है और भारत के ई कॉमर्स बाजार को एक खुला मैदान समझते हुए अपनी मनमानी करते हुए नियमों की धज्जियाँ उड़ाई हैं और अब सरकार का साथ चाहते हैं । क्योंकि ये कंपनियां लगातार नियमों का उल्लंघन कर रही थी और अब अपने व्यापार को नियमों के अनुसार ढ़ालने के लिए इनको सरकार से वक़्त चाहिए !
श्री भरतिया, श्री खंडेलवाल एवं अमर पारवानी ने सरकार को चेताते हुए कहा की किसी भी दबाव में आकर सरकार ने यदि इस पालिसी की तारीख को आगे बढ़ाया या पालिसी में कोई फेरबदल किया तो वो देश के करोड़ों व्यापारियों के हितों के खिलाफ होगा जिसको व्यापारी सहन नहीं करेंगे और सरकार के खिलाफ एक देशव्यापी आंदोलन करेंगे ! कुछ महीनों बाद ही देश में चुनाव है और इस बात को सरकार को ध्यान में रखना होगा । सरकार ने ऐसा कोई भी कदम उठाया तो देश भर के व्यापारी लामबंद होंगे और अपना संघर्ष तेजी के साथ शुरू करेंगे । श्री भरतिया, श्री खंडेलवाल एवं अमर पारवानी ने श्री प्रभु से मांग की है की इन कंपनियों द्वारा गत दो वर्षों में जो पालिसी का उल्लंघन किया गया है उसकी जांच के लिए एक विशेष जांच दल गठित किया जाए और दोषी कंपनियों के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जाए वहीँ दूसरी ओर पालिसी को समुचित रूप से लागू करने के लिए एक रेगुलेटरी अथॉरिटी का गठन किया जाए तथा जो पाबंदियां एफडीआई में लागू हैं वो पाबंदियां घरेलू ई कॉमर्स कंपनियों पर भी लागू की जाये जिससे बाजार में एकरूपता बनी रहे और कोई भेदभाव न हो ।